माता का परोसना…

“मेघा का बरसना और माता का परोसना”
यह मेरी पसंदीदा कहावत है, जिसमे माता के परोसने की तुलना मेघा के बरसने से की है। जितने प्रेम से बादल प्यासी धरती को सींचते हैं, उतने ही प्रेम से माता पूरे परिवार को खाना परोसती है। (बहुत घरों में, माताएँ पूरे परिवार के खाने के बाद  स्वयं खाती है, यद्यपि यह परंपरा मुझे भारत की खोखली पुरुष-प्रधानता का प्रतिबिंब लगती है, फिर भी  माताओं की इस निश्छल चेष्टा का मैं अत्यंत आदर करती हूँ।)

अन्न ये ‘पूर्ण-ब्रह्म’ का सुघोष कर, खाना शुरू करने वाले परिवार में मैं बड़ी हुई। बचपन में जब मैं खाने के स्वाद का अनुमान उसके प्रदर्शन से करती थी, तब मेरी नानी ने मुझे सिखाया कि हर विधि विशिष्ट सामग्रिओं का मिश्रण होती है और इसलिए हर खाने को उदारता से चखना चाहिए। हालांकि आज भी कुछ खानो को देख कर मैं आलोचनात्मक हो जाती हूँ, कोशिश यही रहती है कि मेरा खाने के लिए सम्मान विजयी रहे।

खाने के लिए लगाव केवल खाने को चखने तक सीमित नहीं, खाना बनाने वाले की भावनाओं का सम्मान करना उतना ही अनिवार्य है। कम से कम भारत में यंत्र-मानव रसोइयों का आक्रमण अभी तक नहीं हुआ है, अतः हर बार कोई विधि समान बने, यह अपेक्षित नहीं होना चाहिए। प्रत्येक समय, विधि को नए दृष्टिकोण से  चखना चाहिए। मैं अवश्य मानती हूँ, कि खाना पकाने की कला की अपनी कुछ बारीकियाँ होती हैं और जितना संभव हो सके उनका पालन करना चाहिए, फिर भी ध्यान रहे कि मैं यहाँ पेशेवर रसोइयों की बात नहीं कर रही हूँ।

23 की उम्र तक मैंने माँ और नानी के हाथ के खाने का आनंद उठाया, पर आज एक पत्नी की भूमिका में जब मैं खाना पकाती हूँ, कुछ स्वाद बिना सीखे भी बिलकुल वैसे ही प्रतीत होते हैं जैसे माँ और नानी के हाथ के बने खाने का स्वाद। माताओं के हाथ के खाने का जादू ही ऐसा है, वे सारे स्वाद आपका अंश बन जाते हैं, और अगर आपको सामग्रियों के भिन्न असर की परख हो, तो आप स्वादिष्ट खाना बना सकते हैं जिसमे आपकी माँ के हाथ का प्रभाव अवश्य होगा।

मैं भावुक व्यक्ति नहीं हूँ, मैं दिल से ज्यादा दिमाग से सोचती हूँ, परंतु भोजन, व्यंजन के मामले मैं बहुत भावुक हो जाती हूँ! क्योंकि घर का बना खाना प्यार और सहानुभूति की अभिव्यक्ति है, इस भावना को समझें और सराहें क्योंकि यह अमूल्य है!

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(यह छोटा-सा लेख मैं अपनी माँ, नानी और दादी को समर्पित करती हूँ।)

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4 thoughts on “माता का परोसना…

  1. wondering how you can still write such pure hindi 🙂 good article. now that we are slowly taking up the places of our mothers and grandmothers, I also keep realizing frequently how much they have done for us.. staying in US makes me feel this even more as there is no domestic help of any kind here. I also feel I (and many of our generation) have not respected them enough for the same and need to do that from now on! 🙂

    • Thank you Rucha for your wonderful comment! Mother-daughter & grandmother-granddaughter are really beautiful relationships which are further strengthened by food! 😀 I think we should reciprocate their efforts by cooking for them… 😉

  2. bahut hi sundar lekh .. hindi padhne ki aadat chooth gayi hai … aur tumne kafi bhari bharkam bhasha ka prayog bhi kiya hai …. padhne ke baad woh ek halki si muskruahat aa gayi aur dimaag bhi kharab ho gaya kyunki kal hi lauta mein pune .. .:( ..

    maa ke haath ke parose ki tulna kisi bhi cheez se karna atyant kathin kaam hai .. but tumhari upma mujhe kafi achchi lagi …. bada acchca laga padhke …. maa ke khane ka swaad aa gaya muh mein … 🙂

    meine itni shudh bhasha ka prayog sirf isliye kiya hai kyunki apan bhi to likhe kabhi kuch dhang ka … 😛 warna normally to apan bhasha ki band baja ke rakhte hain 😀

    • धन्यवाद गौरव! एक ऐसे मित्र की टिप्पणी, जो हिंदी में अच्छा हो और जिसे खाने से सच्चा प्यार हो, मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। 🙂
      खैर, जहाँ तक हिंदी की बात आती है, शुद्ध हिंदी में लिखने का मजा ही कुछ और है! 😀

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